पर- ब्रह्म परमेश्वर 

पश्न : मै जिस ब्रह्मंड की रचना करना चाहूँता हूँ,उसमे एक ऐसा कौन सा तत्व डाली जाय की जिसके न रहने पर मै स्वयं भी उसमे न रह सकूं / अर्थात मेरी सता स्पष्ट रूप से व्यक्त न रहे और जिसके रहने पर मेरी सता स्पष्ट प्रतीत होती रहे ----- सुकेशा ?

इसके लिए प्राण रूप सर्वात्मा हिरान्यगार्भ को बनाया / इसके बाद शुभ कर्म में प्रवृत करनेवाली श्रधा --को/ फिर क्रमश: शरीर के उपादान भूत आकाश , वायु , तेज़, जल और पृथ्वी - इन पांचो महाभूतो की सृष्टि की/ इन पांच महाभूतो का कार्य ही  यह दृश्यमान सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है/  इसके बाद मन,बुधी , चित उअर अंहकार - इन चारो अंत:करण को रचा/ अत: करण के संयोग से इन्द्रियों द्वारा किये जाने वाले कर्मो का निर्माण किया / फिर नाम रूपों की रचना की/ इस प्रकार १६ कलाओं से युक्त ब्रह्माण्ड की रचना करके जीवात्मा सहित परमेश्वर स्वंय इसमें प्रविष्ट हुए / इसलिए ये 16 कलाओं वालो पुरुष कहलाते है/

वेद भगवान् - जिस प्रकार रथ के पहिये में लगे रहनेवाले सभी अरे उस पहिये के मध्यस्थ नाभि में प्रविष्ट रहते है, उन सबका आधार नाभि है/ नाभि के बिना वे टिक नहीं सकते है/ उसी प्रकार प्राण और १६ कलाओ के जो आधार है, ये सब कलाएं जिनके आश्रित है, जिनसे उत्पन्न होती है और जिनमे विलीन हो जाती है, वे ही जानने योग्य पर ब्रह्म परमेश्वर है ---- आचार्य पिप्पलाद / 


महर्षि शौनक हजारो शिष्यों के साथ अंगीरा के कुटीर में आकर कर वध उत्सुकता प्रकट की- भगवन! वह परं तत्व क्या है ? 

महर्षि अंगीरा :- मनुष्य के लिए जानने योग्य दो विद्याएं है -- परा और अपरा / जिसके द्वारा इस लोक और परलोक के सम्बन्धी भोगो तथा उनकी प्राप्ति के साधनों का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जिसमे भोगो की स्थिति , भोगो के उपभोग करने के प्रकार, भोग सामग्री की रचना और उनको उपलब्ध करने के साधन आदि का वर्णन है -- वह अपरा विद्या है/ जैसे ऋग्वेद, यजुर्वेद सामवेद और अर्थवेद / जगत के सभी पदार्थो एमव विषयो एक वेदों में भली भाँती वर्णन किया जाता है/
                                
वेदों का उच्चारण करने दी विधि का उपदेश "शिक्षा" है/ जिसमे यज्ञ -याग्य आदि की विधि बतलाई गई है/-- उसे कल्प कहते है/ वैदिक और लौकिक शब्दों के अनुशासन क -प्रकृति-प्रत्यय विभाग पूर्वक शब्द साधन की प्रक्रिया शब्दार्थ बोधक के प्रकार एवम शब्द प्रयोग आदि के नियमो के उपदेश का नाम व्याकरण है/ वैदिक शब्दों का जो कोष है , जिसे अमुक पद, अमुक शब्द का वाचक है --यह बात करण सहित बतलाई गई है/ उसको निरुक्त कहते है/ वैदिक छंदों की जाति और भेद बतलाने की विद्या "छंद" कहलाती है/ गृह और नक्षत्रो की स्थिति गति और उनके साथ हमारा क्या सम्बन्ध है -- इन सब बातो पर जिसमे विचार किया गया है-वह ज्योतिष विद्या है/ इस प्रकार -चार वेद और छ: वेदांग - इन दस का नाम अपरा विद्या है/

जिसके द्वारा पर-ब्रह्म अविनाशी परमात्मा का तत्व ज्ञान होता है -- वह परा विद्या है/
                             विद्या 
       अपरा                                          परा 
(वेद और वेदांग )                   ( अविनाह्सी परमात्मा का तत्व)      

लेकिन अविनाशी परा ब्रह्म (परा विद्या) कैसा है ?
वे अत्यंत सूक्ष्म , व्यापक , अंतरात्मा रूप से सब में फैले हुए और कभी नाश न होने वाले सर्वथा नित्य है / 

इसे तीन उदाहरण से समझा जा सकता है :-

१. मकड़ी अपने पेट में स्थित जाल को बाहर निकाल कर फैलाती है और फिर उसे निगल जाती है उसी पारकर पर ब्रह्म परमेश्वर(परा ) है -------------- मुंडकोपनिषद 

इसे और प्रमाणिकता के रूप में गीता में देख सकते है :- 

भूतानि कौन्तेय प्रकृतिम यांति मामिकाम/ कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम / --- ( जिस प्रकार आकाश में प्रचंड वायु सदा स्थित रहती है उसी प्रकार ये सब (परिवर्तनशील) प्राणी मुझ परिवर्तन शील ब्रह्म) में निवास  करते है --- यह समझ ले //  श्लोक -7  अध्याय -9
प्रकृतिम  स्वामवष्टभय विसृजामि पुन:पुन:/ भूतग्राममिमं कृत्स्नाम्वाशं प्रकृतेर्वशात /( मै अपनी प्रकिती को , अपनी माया को हाथ में लेकर, प्रकृति के , अपने स्वभाव के वश में, रहनेवाले परतंत्र सम्पूर्ण भूतो के समुदाय को वार वार उतपन्न करता हूँ/ श्लोक - 8    अध्याय -9 


जिस प्रकार मनुष्य के शरीर से केश,रोएं और नख अपने आप उतपन्न होते और बढ़ते रहते है - उसके लिए कोई यत्न नहीं करना पड़ता है/ उसी प्रकार पर ब्रह्म परमेश्वर से संचालित है/


चातुर्वर्ण्य मया सृष्टं गुण कर्म विभागश: / तस्य कर्तारमपि मां  विध्य कर्तारंव्ययम // ( मैंने गुणकर्म के विभाग को आधार पर चार वर्णों की सृष्टि की / यद्यपि इस कर्म विभाग का मै कर्ता हूँ तो भी तू यह समझ ले  क़ि अव्यय अकर्ता हूँ/ अव्यय अर्थात -अविनाशी/