तेरे आँचल में इठलाता निष्कलंक बचपन है तुझे देखने को बस मेरा इक छोटा सा मन है तेरे उर कैसे लिपटाऊं इन नन्हें हाथों को प्रतिपल अर्पण तुमको मेरा श्रद्धा का क्रंदन है अंतिम बार फिसलने को हो जब सांसों की माला बाहों में भर लेने को तुम अंतरमन में आना मेरे मन के अंधतिमिर में ज्ञान प्रकाश जगाना निर्मल सुन्दर जीवन पथ पर हे प्रियतम, ले जाना |