सर्व प्रथम हमें समझना है रास्ता जो हमें परम शक्ति "पराशक्ति"से जोड़ता है १.भू लोक २.भाव लोक ३. स्व लोक ४.महा,जना,तपा ४.प्रकृति ५.पुरुष ६.सत्यम लोक ७.निराकार इश्वर अर्थात सम्पूर्ण तत्व "पराशक्ति"
इस मार्ग के अनुसार जब तक साधक भू लोक के प्राणियों को संतुष्ट नहीं करता उसका सम्बन्ध भाव लोक अर्थात पितरों का वास स्थान से नहीं हो सकता अर्थात साधक द्वारा दिया गया अन्न,जल वोह स्वीकार नहीं करते जिस आशय को लेकर साधक अपने पितरों को तर्पण,श्रध्ह के द्वारा प्रसन्न करता है वोह प्रयोजन सिद्धह नहीं होता उसे लगता है उस पर कृपा नहीं हो रही जबकि उसको यह ध्यान नहीं रहता की मनुष्य के इलावा देवता,पितृ,ऋषि कोई भी स्वार्थी नहीं होते और सभी ज्ञान युक्त होकर ब्रह्म निर्दिष्ट सदाचार का पालन करते हैं और जब तक अपने से निचे के समुदाय की तृप्ति नहीं देख लेते हो स्वयं कुछ ग्रहण नहीं करते यही नियम पृथ्वी से ऊपर सभी लोकों में लागु होता है और इस क्रिया को केसे किया जाए उनको संतुष्ट केसे किया जाये  उस विधि को शास्त्रों में "पञ्च महा यज्ञ"कहा गया है .....बाकि कल 
डॉ.बलविंदर वेदिक महारिषि ९७७९२००४३२