जी हाँ ये संभव है आईये इस “गुरु पूर्णिमा” पर इस सत्य को आत्मसात करें सत्य का साक्षात्कार यानि आत्म साक्षात्कार अर्थात स्वयं को जानना ये तीनों एक ही बात है इस युक्ति को सिद्धह करने के लिए हमें सर्व प्रथम मोक्ष प्राप्ति की तीव्र इच्छा जागृत करनी होगी फिर कुछ यम नियमों का पालन करना होगा यम और नियम पांच-पांच यानि कुल दस हैं इन्हें शील कहते हैं ! तो आज इस पुन्य पर्व पर इन दसों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए जीवन में सिद्ध करें इसके सिध्ध होने के बाद एक आम इंसान साधक की श्रेणी में आ जाता है और वोह गुरु द्वारा दिए गए ज्ञान को समझने लायक हो जाता है इस स्थिति को पार करने के बाद आगे का रास्ता यानि “अष्टांग योग” साधक के लिए सुगम हो जाता है मेरे विचार से कम से कम एक वर्ष यम-नियम का पालन करते हुए एवं कर्तव्य पालन करते जीवन निर्वाह करने के बाद ही प्राप्ति संभव है  

सत्य,अहिंसा,अस्तेय,ब्रह्मचर्य,अपरिग्रह ये पांच यम हैं ! शोच,संतोष,तप,स्वाध्याय,इश्वर प्रानिधाना ये पांच नियम है यहाँ इनका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है

१.अहिंसा ! मन,वाणी और शरीर से किसी को भी तनिक भी दुःख न देना अहिंसा है परदोष-दर्शन एवं किसी पर छींटा-कसी भी हिंसा ही है.

२.सत्य ! इन्द्रिय और मन से प्रत्क्ष्य देखकर,सुनकर अथवा अनुमान लगा कर जैसा अनुभव किया ठीक वैसा का वैसा ही भाव प्रगट करने के लिए प्रिय और हितकर तथा दूसरे को उद्वेग उत्पन्न न करने वाले वचन बोलना ही “सत्य” है ! छल रहित कपट रहित व्यवहार का नाम ही सत्य् व्यवहार समझें .

३.अस्तेय ! दूसरे की वास्तु को बिना आज्ञा अपना समझना,उसके स्वत्व का अपहरण,सड़क चलते या किसी के आंगन में लगा फल या फूल वो चाहे आप भगवान को अर्पण करने के निमित्त ही चाहें या व्यापार करते हुए टैक्स की चोरी या रिश्वत खोरी ये सब चोरी ही मानी जाती हैं इन सब का जीवन में आभाव ही अस्तेय है

४.ब्रह्मचर्य ! मन,वाणीऔर शरीर से होने वाले सब प्रकार के मैथूनो का सदा त्याग करके सब प्रकार से शास्त्र विधि का पालन करते हुए वीर्य की रक्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करना ही ‘ब्रह्मचर्य’ है ऐसा आहार-भोजन,ऐसा साहित्य,ऐसा फिल्म चलचित्र,दूर-दर्शन या कोई भी मित्र संग जो काम को जागृत करने वाला हो सभी के संयोग का भी सर्वथा त्याग “ब्रह्मचर्य”है दूसरे शब्दों में भगवान ब्रह्मा जी द्वारा जीवन जीने के लिए बनाये गए नियमों का पालन करना ही “ब्रह्मचर्य” है.

५.अपरिग्रह ! अपनी आवश्यकता से अधिक या किसी दूसरे का धन हडपना या किसी कर्मचारी या मजदूर की मजदूरी रख लेना परिग्रह है किसी भोग-सामग्री का आवश्यकता से अधिक संग्रह करना भी परिग्रह है अतः इन क्रियाओं का जीवन में आभाव ही “अपरिग्रह” है

इन यमों का जीवन में हर् परिस्थिति में निरंतर पालन होने पर ये “महाव्रत” कहलाते हैं

 

अब बात आती है नियमों की ये भी पांच हैं ----

१.शोच ! बाह्य शरीर,वस्त्र,मकान एवं आस-पास आदि के मल(गन्दगी) को दूर करना बाहर की शुध्ही है जप,तप,और शुद्ध विचारों एवं अन्तः कर्ण के राग द्वेष आदि मलों  का नाश करना ही अन्तः शोच यानि अंदर की शुध्ही है न्याययुक्त धन से खरीदा हुआ शुद्ध परिवेश एवं क्रिया द्वारा पकाया हुआ सात्विक भोजन अन्तः एवं बाह्य शुध्ही में सहायक है.

२.संतोष ! कर्त्तव्य पालन करते हुए अर्थ अर्जन के लिए जो प्रयत्न किया जाता है से अपने आप जो प्राप्त होता है और जिस परिस्थिति या परिवेश में रहने का संयोग प्राप्त हो प्रारब्ध एवं वर्तमान कर्मानुसार जो भोग प्राप्त हों उनमें सुखी महसूस करते हुए इश्वर का धन्यबाद करना ही “संतोष” है.

३.तप ! यम नियम आदि के पालन में जो कठिनाई आती हैं और सत्य के मार्ग पर चलते हुए जीवन निर्वाह करने में एवं कर्तव्य पालन करने में जो कष्ट एवं लोक निंदा या परिहास सहन करना पड़ता है उस  समय बिना शिकायत किये सुख का अनुभव करना “तप” है.

४.स्वाध्याय ! शरीर के पांच तत्वों के शोधन के लिए एवं आत्म कल्याण के लिए शास्त्र विधि अनुसार मंत्र जप करना,गीता,रामायण,वेद,उपनिषद,पुराण एवं अन्य सद शास्त्र पड़ना एवं पढाना स्वाध्याय है

५.इश्वर-प्रानिधाना ! इश्वर के नाम,रूप,गुण,लीला,धाम,प्रभाव आदि का श्रवण,कीर्तन,मनन एवं चर्चा करते हुए अपने समस्त कर्म भगवान को समर्पित कर देना एवं अपने को इश्वर के हाथ की मशीन/यंत्र की तरह मानना एवं उन्हीं के अनुसार कर्म करना उनमें अटूट प्रेम करना केवल उनसे ही इच्छा करना उनके लिए ही हर् भले-बुरे कर्म करना जीवन का प्रत्येक प्रयत्न उनकी खुशी के लिए करना इश्वर के इलावा किसी और से कोई इच्छा न रखना ही सच्ची “शरणागति”है अर्थात केवल उसका –उसके लिए हो जाना ही “इश्वर-प्रानिधाना” है