भारतीय संस्कृति के अंतर्गत पितरों को अन्न जल केवल उसके परिवार वाले ही दे सकते हैं वोह किसी और के हाथ से अन्न-जल ग्रहण नहीं करते (कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़ कर) अतः पित्री तर्पण श्राद्ध का महत्त्व अधिक है

श्रध्हा से जो दिया जाये वोही श्राध्ह है : धर्म शात्रों के अनुसार पितरों को पिंड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु,पुत्र-पोत्रादी,यश,स्वर्ग,पुष्टि,बल,लक्ष्मी,सुख-सोभाग्य सभी अनायास ही प्राप्त कर लेता है यही नहीं जब तक हमारे पितृ तृप्त होकर प्रसन्न नहीं होंगे हमें मोक्ष असंभव है अतः हर् मनुष्य को इन पूर्ण पित्री पक्ष में यथा योग्य नित्य प्रति पंच्बली,बलिवेश्व्देव एवं तर्पण करें एवं तिथि विशेष यानि किसी भी पूर्वज की अंत्येष्ठी तिथि पर पूर्ण श्राध्ह+तर्पण इत्यादि कर्म करे देव कार्य में ब्रह्मण परीक्षा भले ही न करे परन्तु पित्री कार्य में ब्राह्मण सद्गुणी,सात्विक,विद्या संपन्न,नित्य कर्मकांडी,हो एवं शास्त्र या भगवान की पूजा करके धन कमाने वाला न हो लंगड़ा,काना,आपका नोकर, या अंगहीन ब्रह्मण वर्जित है परिस्थिति वश श्रेष्ठ ब्राह्मण न मिले तो आपका दोहता,भांजा,बहनोई,दामाद,शिष्य,गुरु एवं वैश्य और क्षत्रिय जो कर्मकांडी भक्त हों ये सभी श्रध्ह ग्रहण करने के अधिकारी हैं !

इसी प्रकार श्रध्ह करता को भी इन दिनों दातुन करना,पान खाना,शरीर पर साबुन तेल लगाना, स्त्री-संग करना दूसरे का या अपवित्र अन्न ग्रहण करना सभी वर्जित है !

श्राध्ह के भोजन में लहसुन,प्याज,उर्द/अरहर/मूंग/की दाल कद्दू,घिया की सब्जी वर्जित है ! दाल के दहीबड़े ठीक हैं

श्राध्ह वाले दिन नहा-धोकर अपना नाम गोत्र बोल कर संकल्प इस प्रकार करें “ओं विष्णु-विष्णु-विष्णु अश्विनमासे कृष्ण पक्षे (तिथि) श्राद्द पक्ष अन्तरगते (अपना गोत्र ) ..नाम .मम ...पितु/माता/दादा/दादी ...नाम अक्षय तृप्तअर्थम इदम अन्नम तस्मै (माता या दादी में तस्य )स्वधा !

ऐसा बोल कर दाहिने अंगूठे से ओं इद्मान्न्म बोलते हुए थाली में सजाई हुए सभी अन्न को , iइदम आपः जल को, इद्माज्यम कह कर घी को, इदम हवी पुनः अन्न को एक-एक बार स्पर्श करें इस प्रकार अभी मंत्रित थाली जल समेत गौ माता को खिलाएं!

पात्र में छना हुआ पानी लें उसमें गंगा जल दूध दही शहद मिला लें इस जल से तर्पण करें !

कुछ चावल देसी घी मिला कर बना लें जिससे बलिवैश्वदेव पूर्ण करें !

बचे हुए चावल और श्राद्ध के लिए पकाया अन्न {सभी कुछ थोडा-थोडा}पांच जगह लेकर पञ्च बलि की क्रिया पूर्ण करें !

थोड़ी सी अग्नि जला कर उसमें खीर से तीन आहुति दिव्या पितरों के लिए प्रदान करें !

फिर ब्राह्मण भोजन का संकल्प करें      “ओं विष्णु-विष्णु-विष्णु अश्विनमासे कृष्ण पक्षे (तिथि) श्राद्द पक्ष अन्तरगते (अपना गोत्र ) ..नाम .मम ...पितु/माता/दादा/दादी ...नाम अक्षय तृप्तअर्थम इदम अन्नम तस्मै (माता या दादी में तस्य ) यथा संख्यानाम (ब्राह्मणों की संख्या) ब्रह्मणां भोजनम अहम ददामि