ब्रह्मर्षि किरीट भाई कहते हैं कि कोई ज्ञानी हो सकता है लेकिन भक्त हो यह जरुरी नही है. भक्ति में तो ज्ञान के साथ वैराग्य का समावेष होता है.

ऋषिवर के अनुसार भक्ति सद्गुण की जननी है. भक्ति में भगवान के प्रति आसक्ति होती है. भक्त में वैराग्य का भाव है.वैराग्य समाज के प्रति पैदा करने से कुछ नही होता. वैराग्य तो मन के प्रति होना चाहिये. जो अपने आपको जीत ले वही विजेता है.